03 जून 2023, ज्येष्ठ शुक्ल 14
वट सावित्री

वट सावित्री व्रत का विशेष महत्‍व है. मान्‍यता है कि इस व्रत को रखने से पति पर आए संकट चले जाते हैं और आयु लंबी हो जाती है. यही नहीं अगर दांपत्‍य जीवन में कोई परेशानी चल रही हो तो वह भी इस व्रत के प्रताप से दूर हो जाते हैं. सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखद वैवाहिक जीवन की कामना करते हुए इस दिन वट यानी कि बरगद के पेड़ के नीचे पूजा-अर्चना करती हैं.



इस व्रत को लेकर काफी मतभेद है, स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह व्रत करने का विधान है, वहीं निर्णयामृत आदि के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को व्रत करने की बात कही गई है।
तिथियों में मतभेद होने के उपरान्त भी इस व्रत का उद्देश्य एक ही है। कई महिलायें इस व्रत को ज्येष्ठ मास की त्रयोदशी से अमावस्या तक करने में विश्वास करती है और इसी प्रकार शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से पूर्णिमा तक करती है। जो भगवान विष्णु की पूजा करते है, ज्यादातर इस व्रत को पूर्णिमा में करते है।

इस दिन सावित्री और सत्‍यवान की कथा सुनने का विधान है. मान्‍यता है क‍ि इस कथा को सुनने से मनवांछित फल की प्राप्‍ति होती है. पौराणिक कथा के अनुसार सावित्री मृत्‍यु के देवता यमराज से अपने पति सत्‍यवान के प्राण वापस ले आई थी. वट सावित्री व्रत के दिन ही शनि जयंती भी मनाई जाती है.

वट सावित्री व्रत का महत्‍व -
वट का मतलब होता है बरगद का पेड. बरगद एक विशाल पेड़ होता है. इसमें कई जटाएं निकली होती हैं. इस व्रत में वट का बहुत महत्व है. कहते हैं कि इसी पेड़ के नीचे स‍ावित्री ने अपने पति को यमराज से वापस पाया था.
सावित्री को देवी का रूप माना जाता है. हिंदू पुराण में बरगद के पेड़े में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास बताया जाता है. मान्यता के अनुसार ब्रह्मा वृक्ष की जड़ में, विष्णु इसके तने में और शि‍व उपरी भाग में रहते हैं.
यही वजह है कि यह माना जाता है कि इस पेड़ के नीचे बैठकर पूजा करने से हर मनोकामना पूरी होती है.

वट सावित्री पूर्णिमा पूजन विधि -
  • वट सावित्री पूर्णिमा के दिन सर्वप्रथम विवाहित यानि सुहागन महिलाएं सुबह उठकर अपने नित्य क्रम से निवृत हो स्नान करके शुद्ध हो जाएं।
  • फिर नए वस्त्र पहनकर सोलह श्रृंगार कर लें।
  • इसके बाद पूजन के सभी सामग्री को डलिया या थाली में सजा लें।
  • वट वृक्ष के नीचे जाकर वहां पर सफाई कर सभी सामग्री रख लें।
  • सबसे पहले सत्यवान एवं सावित्री की मूर्ति स्थापित करें। अब धूप, दीप, रोली, सिंदूर से पूजन करें।
  • लाल कपड़ा सत्यवान-सावित्री को अर्पित करें तथा फल समर्पित करें।
  • फिर बांस के पंखे से सत्यवान-सावित्री को हवा करें।
  • बरगद के पत्ते को अपने बालों में लगायें। अब धागे को बरगद के पेड़ में बांधकर यथा शक्ति 5,11,21,51, या 108 बार परिक्रमा करें इसके बाद सावित्री-सत्यवान की कथा पंडित जी से सुनें तथा उन्हें यथासंभव दक्षिणा दें या कथा स्वयं पढ़ें।
  • इसके बाद घर में आकर उसी पंखे से अपने पति को हवा करें तथा उनका आशीर्वाद लें। उसके बाद शाम के वक्त एक बार मीठा भोजन करें।