28 जुन 2023, आषाढ़ शुक्ल 10
आशा दशमी

आशा दशमी व्रत का प्रारंभ महाभारत काल से माना जाता है। यह व्रत किसी भी मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि से आरंभ किया जा सकता है। यह व्रत करने से मनुष्य के जीवन की सभी आशाएं पूर्ण होती हैं।



जीवन की समस्त आशाओं को पूर्ण करने वाला आशा दशमी व्रत इस वर्ष 19 जुलाई 2021, सोमवार को मनाया जा रहा है। आइए जानें कैसे और कितने समय के लिए करें यह व्रत-
कितने समय करें -
यह व्रत 6 माह, 1 वर्ष अथवा 2 वर्षों त‍क करना चाहिए।
व्रत कैसे करें -
दशमी के दिन प्रात: नित्य कर्म, स्नानादि से निवृत्त होकर देवताओं का पूजन करके रात्रि में पुष्प, अलक तथा चंदन आदि से 10 आशा देवियों की पूजा करनी चाहिए। इस दिन माता पार्वती का पूजन किया जाता है।
इस व्रत को करने वाले हर मनुष्‍य को आंगन में दसों दिशाओं के चित्रों की पूजा करनी चाहिए। दसों दिशाओं के अधिपतियों की प्रतिमा, उनके वाहन तथा अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित कर दस दिशा देवियों के रूप में मानकर पूजन करना चाहिए।
इसके पश्‍चात निम्न प्रार्थना करती चाहिए।
'आशाश्चाशा: सदा सन्तु सिद्ध्यन्तां में मनोरथा:।
भवतीनां प्रसादेन सदा कल्याणमस्त्विति।।'
यानी 'हे आशा देवियों, मेरी सारी आशाएं, सारी उम्मीदें सदा सफल हों। मेरे मनोरथ पूर्ण हों, मेरा सदा कल्याण हो, ऐसा आशीष दें।'
तत्पश्चात ब्राह्मण को दान-दक्षिणा देने के बाद प्रसाद स्वयं ग्रहण करना चहिए।
इसी तरह तब तक हर महीने इस व्रत को करना चाहिए। जब तक आपकी मनोकामना पूर्ण न हो जाए।
आशा दशमी का व्रत के करने से सभी आशाएं पूर्ण हो जाती हैं।
व्रत का लाभ -
इस व्रत के पीछे यह धार्मिक मान्यता है कि कोई भी कन्या इस व्रत को करने से श्रेष्ठ वर प्राप्त करती है।
अगर किसी स्त्री का पति यात्रा प्रवास के दौरान जल्दी घर लौट कर नहीं आता है तब सुहागन स्त्री इस व्रत को करके अपने पति को शीघ्र प्राप्त कर सकती है।
आशा दशमी व्रत उद्यापन विधि -
आशा दशमी व्रत की पूजा विधि के साथ उद्यापन विधि का भी ज्ञान होना आवश्यक है। इसके लिए उद्यापन में आशादेवियों की सोने, चांदी अथवा मिट्टी से प्रतिमा बना लें। घर के आंगन में उनकी पूजा करनी चाहिए। फिर ऐन्द्री, आग्रेयी, याम्या, नैऋति, वारुणी, वाल्व्या, सौम्या, ऐशनी, अध्: तथा ब्राह्मी इन दश आशा देवियो से कामनाओं की सिद्धि के लिये प्रार्थना करें। जो मनोकामना हो उसे बार-बार दोहराएं।
फिर नक्षत्रो, ग्रहों, ताराग्रहो, नक्षत्रों मातृकाओ, भूत–प्रेत अपनी अभिष्ट सिद्धि की प्रार्थना करें। पुष्प, फल, धूप, वस्त्र आदि से विधिवत पूजा करें। सुहागिन स्त्रियां रात्रि जागरण करें। फिर परिवार व मित्रजनों के साथ भोजन ग्रहण कर व्रत समापन करना चाहिए।