| विसूचिका (हैजा) के घरेलु उपचार |
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हैजा का नाम सुनते ही लोग भयभीत हो जाते हैं| यह प्राय: महामारी के रूप में फैलता है| यह रोग गरमी के मौसम के अंत में या वर्षा ऋतु की शुरू में पनपता है| यदि इसका इलाज समय से युद्ध स्तर पर न किया जाए तो यह घातक सिद्ध हो सकता है| विसूचिका को मक्खियां तथा कुछ सूक्ष्म जीवाणु फैलाते हैं| इस रोग के फैलने पर लगभग 80 प्रतिशत रोगी उचित इलाज न होने के कारण मौत की गोद में चले जाते हैं| हैजे का इलाज करने के साथ-साथ इसको फैलने से रोकना भी चाहिए| रोगी के दस्तों तथा उलटी को तुरन्त रोकने के लिए उचित औषधि दें| कुछ विद्वानों का कहना है की दस्तों तथा उल्टियों को धीरे-धीरे रोकना चाहिए| हैजे के रोगी का शान्तचित्त होकर इलाज कराना हितकर है| |
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1. सोंठ, कालीमिर्च, अजवायन, तुलसी, नमक, शक्कर, नीबू और पुदीना प्रत्येक घर में सोंठ, कालीमिर्च, अजवायन तथा पुदीना आसानी से मिल जाता है| अत: इन सबको पीसकर चूर्ण बना लें| फिर औटाए हुए पानी के साथ 3-3 ग्राम की मात्रा में चूर्ण थोड़ी-थोड़ी देर बाद दें| पानी में चार-पांच पत्तियां तुलसी की डाल दें| इस पानी को खौलकर ठंडा करके रख लें| इसमें जरा-सा नमक, जरा-सी शक्कर और नीबू डालकर बार-बार पिलाएं| रोगी के पेट में पानी कम न होने दें| 2. नीम नीम की आठ-दस पत्तियों को पीसकर पानी में घोलकर रोगी को पिलाएं| नीम हैजे के रोगाणुओं को नष्ट कर देता है| 3. लौंग और पानी लौंग का पानी देने से रोगी का वमन शीघ्र रुक जाता है और पेशाब आने लगता है| 4. राई रोगी के शरीर पर राई का लेप करने से उल्टी और दस्त में लाभ होता है| इससे रोगी के शरीर का कम्पन भी रुक जाता है| 5. करेला और सेंधा नमक चार चम्मच करेले का रस लेकर उसमें जरा-सा सेंधा नमक मिलाकर रोगी को थोड़ी-थोड़ी देर बाद बार-बार पिलाएं| 6. लहसुन जहां रोगी लेटा हो, वहां काफी सफाई रखें| लहसुन की चार-पांच कलियां रोगी के सिरहाने और पांयंते रख दें| इससे हैजे के कीटाणु नष्ट हो जाएंगे| 7. प्याज, नीबू, नमक, तुलसी, पानी और कालीमिर्च चार चम्मच प्याज का रस, एक नीबू का रस, थोड़ी-सी कालीमिर्च तथा एक चुटकी नमक-सभी को तुलसी की पत्तियों के पानी में मिलाकर थोड़ी-थोड़ी देर बाद रोगी को पिलाते रहें| 8. गरम पानी, नीबू, पुदीना और धनिया गरम पानी में नीबू व धनिया (हरा) या पुदीने का रस मिलाकर पिलाएं| जब तक उल्टी होती रहे, तब तक यह पानी बार-बार पिलाते रहें| 9. जायफल और गुड़ जायफल के चूर्ण में जरा-सा गुड़ मिलाकर खिलाने से रोगी को काफी आराम मिलता है| 10. सौंफ और इलायची रोगी को अर्क सौंफ तथा अर्क इलायची मिलाकर दें| 11. गुलाबबजल और नीबू गुलाबबजल में नीबू निचोड़कर पिलाने से रोगी को लाभ होता है| 12. तुलसी और कालीमिर्च रोगी को तुलसी के चार-पांच पत्ते तथा चार दाने कालीमिर्च की चटनी बनाकर खिलाएं| 13. नारियल नारियल का पानी चार-पांच बार पिलाने से हैजे की उल्टी रुक जाती| 14. आम और पानी कै-दस्त के समय आम के कोंपलों की चटनी बनाकर आधा लीटर पानी में उबालें| जब पानी आधा रह जाए तो छानकर सहता-सहता पिलाएं| 15. पानी और कपूर पानी में कपूर का अर्क मिलाकर रोगी को बार-बार पिलाएं| 16. शहद और फिटकिरी एक चम्मच शहद में एक रत्ती फिटकिरी का चूर्ण मिलाकर देने से भी रोगी को काफी लाभ होता है| 17. गूलर और पानी गूलर के पत्तों को पीसकर चार चम्मच रस निकाल लें| इस रस को पानी में घोलकर रोगी को बार-बार पिलाएं| विसूचिका (हैजा) में क्या खाएं क्या नहीं रोगी को नीबू-पानी, उबला हुआ पानी और तुलसी की पत्तियों का पानी ठंडा करके अथवा सौंफ का पानी दें| गरमी के दिनों में बर्फ चूसने के लिए दें| यदि उल्टी और दस्त बंद हो जाएं किन्तु पेशाब न आए तो कलमी शोरा कपड़े में डालकर रोगी के पेड़ू पर रखें| भोजन में कोई भी ठोस चीज खाने के लिए नहीं देनी चाहिए| फलों का रस, नीबू की शिकंजी, फलों का शरबत, दही की पतली लस्सी या अनन्नास का जूस घूंट-घूंट करके दिया जा सकता है| दो-तीन दिन बाद मूंग की दाल की पतली-पतली खिचड़ी खाने के लिए दें| साथ में पुदीने की चटनी अवश्य खिलाएं| रोग दूर हो जाने पर भी कुछ दिनों तक खिचड़ी, तरोई की सब्जी और चपाती देते रहें| विसूचिका (हैजा) का कारण हैजा एक संक्रामक बीमारी है| इसके जीवाणु भोजन और जल में मिलकर शरीर में चले जाते हैं| ये जीवाणु शरीर में प्रवेश करने के दूसरे या तीसरे दिन रोग फैलाते हैं| जो लोग गांवों में तालाबों, पोखरों, नालों और नदियों के किनारे रहते हैं, वे दूषित पानी पीकर इस रोग को ग्रहण कर लेते हैं| हैजे के रोगाणु दूध, खुली मिठाईयां, मूत्र, थूक, वमन, मल आदि के द्वारा भी फैलते हैं| इस प्रकार दूषित तथा गंदे वातावरण में रहने, हजम न होने वाली वस्तुएं खाने, अत्यधिक परिश्रम करने के तुरन्त बाद पानी पी लेने, बासी भोजन करने, अशुद्ध जल पीने आदि के कारण यह रोग फैलता है| विसूचिका (हैजा) की पहचान हैजे में रोगी को कै-दस्त शुरू हो जाते हैं| दस्त चावल के मांड़ के समान सफेद होते हैं| प्यास अधिक लगती है| पेशाब रुक जाता है| रोगी को बहुत कमजोरी हो जाती है| साथ-पैरों में दर्द और अकड़न होती है| शरीर में पानी की काफी कमी हो जाती है| इसी कारण अनेक रोगियों के प्राण निकल जाते हैं| |