गलगण्ड-हस्तिकर्ण मूल को तण्डुलोदक से पीसकर गलगण्ड पर लेप करने से लाभ होता है।
- क्षय रोग-1 ग्राम हस्तिकर्ण कंद चूर्ण में समभाग गिलोय चूर्ण मिलाकर सेवन करने से क्षय रोग में लाभ होता है।
- अतिसार एवं अर्बुद-5 मिली हस्तिकर्ण मूल स्वरस में जल मिलाकर सेवन करने से अतिसार एवं उदरगत अर्बुद में लाभ होता है।
- उदर-रोग-हस्तिकर्ण की पत्तियों का शाक बनाकर सेवन करने से उदर विकारों का शमन होता है।
- अर्श-हस्तिकर्ण के कंद को मधु के साथ घिसकर अर्श में लेप करने से लाभ होता है।
- यकृत्विकार-हस्तिकर्ण कंद में पुनर्नवा मिलाकर क्वाथ बनाकर 15-20 मिली मात्रा में सेवन करने से यकृत् विकार, प्लीहा विकार, पाण्डु तथा उदर कृमियों का शमन होता है।
- संधिशूल-हस्तिकर्ण कंद का काढ़ा बनाकर जोड़ों पर बफारा देने से संधिशूल का शमन होता है।
- गठिया-15-20 मिली हस्तिकर्ण कंद के काढ़े में 1 ग्राम मानकंद का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से गठिया में लाभ होता है।
- दद्रु-मूल को पीसकर लेप करने से दद्रु, गीनिया कृमि, व्रण तथा दाह में लाभ होता है।
- मूल कल्क को पीसकर लेप करने से शूल का शमन होता है।
- रसायन-प्रतिदिन प्रातकाल 1 ग्राम हस्तिकर्ण पलाश की मूल को पीसकर घृत मिलाकर सेवन करने से तथा हितकर आहार विहार करने से दीर्घायु बल आदि की वृद्धि होती है।
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