- श्वसनतंत्र की बीमारीयों में तम्बाकू की तरह चिलम में भरकर पीने से यह अत्यन्त लाभकारी होता है, परन्तु यह प्रयोग लम्बे समय तक नहीं करना चाहिए; इससे मस्तिष्क में दुष्प्रभाव उत्पन्न हो सकते हैं।
- इसके बीजों को जलते हुए कोयले में डालकर सूंघने से श्वासावरोध में लाभ होता है।
- हृत्पत्री के पत्रों से प्राप्त अर्क (डिजिटेलिन) रक्ताधिक्यजन्य हृदयावरोध (उच्च या निम्न रक्त भार से सम्बद्ध या असम्बद्ध), हृक्षिप्रता एवं कपाट विकृति की चिकित्सा में अत्यन्त प्रभावी है।
- तिलपुष्पी पञ्चाङ्ग में अर्जुन छाल मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से हृदयावरोध तथा हृदशूल में लाभ होता है।
- तिलपुष्पी के 2-3 ग्राम पञ्चाङ्ग को सुखाकर, काढ़ा बनाकर प्रात सायं पीने से घबराहट तथा उच्चरक्तचाप में लाभ होता है।
- वृक्कावरोध-हृत्पत्री का प्रयोग वृक्कावरोध की चिकित्सा में किया जाता है।
- तिलपुष्पी पञ्चाङ्ग में पाषाणभेद मिलाकर चूर्ण बनाकर प्रात सायं जल के साथ सेवन करने से यह मूत्रल तथा वृक्कदोषों में लाभकारी होता है। (विषाक्त पौधा होने से प्रकृति तथा अनुपान के अनुसार अल्प मात्रा में प्रयोग करें।)
- जलशोफ-हृत्पत्री का प्रयोग जलशोफ (Dropsy) के उपचार में किया जाता है।
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